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जानिए देवउठनी एकादशी की व्रत कथा, कैसे स्वंय श्रीकृष्ण ने बता इसका महाम्त्य, मृत्यु के बाद मिलता हैं बैंकुठ धाम

Dev Uthani Ekadashi Katha
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हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु 4 महीने की योग निद्रा से बाहर आते हैं। उनके बाहर आते ही भगवान शिव सृष्टि का संचालन पुन: श्री हरि के हाथ में सौंप देते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, असुर राज बलि को दिए वचन के कारण भगवान विष्णु देवशयनी एकादशी से लेकर देवउठनी एकादशी तक पाताल लोक में विराजमान रहते हैं। जिसके चलते इस दौरान संसार में सभी शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं।

Dev Uthani Ekadashi Katha
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देवउठनी एकादशी की व्रत कथा –

धर्म ग्रंथों के स्वंय श्रीकृष्ण ने इसका महाम्त्य बताया है। इस कथा के अनुसार एक राज्य में एकादशी के दिन प्रजा से लेकर पशु तक कोई भी अन्न नहीं ग्रहण करता था। एक दिन भगवान विष्णु ने राजा की परीक्षा लेने की सोची और सुंदरी भेष बनाकर सड़क किनारे बैठ गए। राजा की भेंट जब सुंदरी से हुई तो उन्होंने उसके यहां बैठने का कारण पूछा तब स्त्री ने बताया कि, “वह बेसहारा है।” राजा उसके रूप पर मोहित हो गए और बोले कि, “तुम रानी बनकर मेरे साथ महल चलो।”

सुंदर स्त्री के राजा के सामने शर्त रखी कि – “ये प्रस्ताव तभी स्वीकार करेगी जब उसे पूरे राज्य का अधिकार दिया जाएगा और वह जो बनाए राजा को खाना होगा।” राजा ने शर्त मान ली और अगले दिन एकादशी पर सुंदरी ने बाजारों में बाकी दिनों की तरह अन्न बेचने का आदेश दिया। मांसाहार भोजन बनाकर राजा को खाने पर मजबूर करने लगी राजा ने कहा कि – “आज एकादशी के व्रत में तो मैं सिर्फ फलाहार ग्रहण करता हूं। रानी ने शर्त याद दिलाते हुए राजा को कहा कि अगर यह तामसिक भोजन नहीं खाया तो मैं बड़े राजकुमार का सिर धड़ से अलग कर दूंगी।”

Dev Uthani Ekadashi Katha
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राजा ने अपनी स्थिति बड़ी रानी को बताई। बड़ी महारानी ने राजा से धर्म का पालन करने की बात कही और अपने बेटे का सिर काट देने को मंजूर हो गई। राजा हताश थे और सुंदरी की बात न मानने पर राजकुमार का सिर देने को तैयार हो गए, सुंदरी के रूप में श्रीहरि राजा के धर्म के प्रति समर्पण को देखर अति प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने असली रूप में आकर राजा को दर्शन दिए।

विष्णु जी ने राजा को बताया कि, तुम परीक्षा में पास हुए, कहो क्या वरदान चाहिए। तब राजा ने इस जीवन के लिए प्रभू का धन्यवाद किया और कहा कि, “अब मेरा उद्धार कीजिए। राजा की प्रार्थना श्रीहरि ने स्वीकार की और वह मृत्यु के बाद बैंकुठ लोक को चला गया।”

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