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तालिबान-भारत रिश्तों में बड़ा मोड़: अफगानिस्तान के नए प्रस्ताव पर भारत की रणनीति तय, पाकिस्तान की बढ़ सकती है मुश्किल

तालिबान-भारत रिश्तों में बड़ा मोड़: अफगानिस्तान के नए प्रस्ताव पर भारत की रणनीति तय, पाकिस्तान की बढ़ सकती है मुश्किल

भारत और तालिबान के बीच संबंधों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई हलचल शुरू हो गई है। अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज तालिबान ने हाल ही में भारत को एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव भेजा है, जिसके बाद दक्षिण एशिया की कूटनीतिक राजनीति में हलचल तेज हो गई है। यह प्रस्ताव भारत की सुरक्षा, रणनीति और क्षेत्रीय स्थिरता को सीधे प्रभावित कर सकता है। इसी कारण भारत अब इस पर गंभीरता से विचार कर रहा है।

खबरों के मुताबिक, तालिबान चाहता है कि भारत अफगानिस्तान में अपने विकास कार्य दोबारा शुरू करे और काबुल में राजनयिक उपस्थिति बहाल करे। इस प्रस्ताव को कई विशेषज्ञ पाकिस्तान के लिए झटका मान रहे हैं, क्योंकि पाकिस्तान वर्षों से तालिबान पर अपना प्रभाव बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। अगर भारत और तालिबान के बीच सीधी बातचीत या समझौता बढ़ता है, तो पाकिस्तान की ‘स्ट्रैटेजिक डेप्थ’ की पूरी थ्योरी कमजोर पड़ सकती है।

भारत लंबे समय से अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में सबसे बड़े साझेदारों में से रहा है। सड़कें, अस्पताल, स्कूल से लेकर संसद भवन तक—भारत ने अफगानिस्तान में 20 सालों में 3 बिलियन डॉलर से अधिक का निवेश किया है। तालिबान की सत्ता आने के बाद अगस्त 2021 में भारत ने अपनी राजनयिक उपस्थिति वापस ले ली थी। लेकिन अब तालिबान चाहता है कि भारत फिर से सक्रिय भूमिका निभाए, क्योंकि चीन और पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव से तालिबान खुद भी संतुष्ट नहीं बताया जा रहा।

विशेषज्ञों का मानना है कि तालिबान का यह प्रस्ताव कई रणनीतिक संकेत देता है। पहला, तालिबान भारत को क्षेत्रीय संतुलन का अहम हिस्सा मान रहा है। दूसरा, पाकिस्तान द्वारा अफगानिस्तान पर हो रहे कथित हवाई हमलों और सीमा विवाद के चलते तालिबान इस बात को समझ चुका है कि पाकिस्तान का भरोसा करना हमेशा सुरक्षित नहीं है। तीसरा, तालिबान अंतरराष्ट्रीय मान्यता पाने के लिए भारत जैसे बड़े लोकतंत्र के साथ रिश्ते सुधारना चाहता है।

हालांकि भारत इस प्रस्ताव पर अत्यंत सावधानी से विचार कर रहा है। भारत की प्रमुख चिंता है—आतंकवाद की सुरक्षित पनाहगाहें, अल-कायदा और हक्कानी नेटवर्क की गतिविधियां, तथा भारत-विरोधी तत्वों को समर्थन। भारत किसी भी तरह की पहल करने से पहले सुरक्षा एंग्ल को मजबूती से परखना चाहता है।

इसके अलावा भारत को यह भी देखना है कि तालिबान के अंदर विभिन्न गुटों का प्रभाव किस दिशा में बढ़ रहा है। हक्कानी नेटवर्क पाकिस्तान से गहरे रूप में जुड़ा माना जाता है, जबकि तालिबान का कंधारी गुट अपेक्षाकृत स्वतंत्र निर्णय लेने में विश्वास रखता है। यह अंदरूनी राजनीति भारत के निर्णय को काफी प्रभावित कर सकती है।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर पाकिस्तान पर पड़ने वाला है। भारत और तालिबान के रिश्ते बेहतर होते हैं तो पाकिस्तान का अफगानिस्तान पर दबदबा कमजोर पड़ सकता है। आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए यह स्थिति और मुश्किलें खड़ी कर देगी।

कुल मिलाकर, तालिबान का प्रस्ताव दक्षिण एशिया की कूटनीति में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है। भारत का फैसला न केवल अफगानिस्तान भविष्य को प्रभावित करेगा, बल्कि पाकिस्तान की रणनीतिक स्थिति भी बदल देगा।

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