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बौद्धों पर हिंदू कानून लागू होने के खिलाफ याचिका सुप्रीम कोर्ट में, SC ने मामला विधि आयोग को भेजा

बौद्धों पर हिंदू कानून लागू होने के खिलाफ याचिका सुप्रीम कोर्ट में, SC ने मामला विधि आयोग को भेजा

नई दिल्ली। भारत में बौद्ध समुदाय पर हिंदू पर्सनल कानून लागू होने को चुनौती देने वाली एक महत्वपूर्ण याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि हिंदू मैरिज एक्ट, हिंदू सक्सेशन एक्ट और अन्य पर्सनल लॉ को बौद्धों पर लागू करना उनके मौलिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को फिलहाल फैसला देने के बजाय विधि आयोग (Law Commission) को भेज दिया है और इसे एक औपचारिक प्रतिनिधित्व के तौर पर देखने का निर्देश दिया है।

यह फैसला मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने दिया, जिन्होंने बुद्धिस्ट पर्सनल लॉ एक्शन कमेटी की याचिका पर सुनवाई करते हुए आयोग को मौजूदा कानूनों पर विचार करने और जरूरत पड़ने पर संशोधन की सिफारिश करने की सलाह दी।

याचिका में क्या कहा गया?

याचिका में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भारत में बौद्ध समुदाय एक अलग धर्म और सांस्कृतिक पहचान रखता है। इसके बावजूद उन्हें हिंदू पर्सनल लॉ के दायरे में रखा गया है, जो उनकी धार्मिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक प्रथाओं के खिलाफ है। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि बौद्ध समुदाय का विवाह, विरासत, गोद लेने और संरक्षण से जुड़ा पारंपरिक ढांचा हिंदू परंपराओं से अलग है, इसलिए उन पर हिंदू कानून लागू करना अनुचित और असंवैधानिक है।

उनका कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 25 में बौद्ध, जैन और सिख समुदायों को “हिंदू” की परिभाषा में शामिल कर दिया गया है, जिसके कारण पर्सनल लॉ में उन्हें स्वायत्तता नहीं मिल पाती। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी धार्मिक समुदाय के व्यक्तिगत और पारिवारिक कानून उनके अपने सांस्कृतिक ढांचे पर आधारित हों।

वर्तमान में कौन से कानून लागू होते हैं?

याचिका में बताया गया कि बौद्ध समुदाय पर वर्तमान में ये हिंदू कानून लागू होते हैं—

  • Hindu Marriage Act, 1955

  • Hindu Succession Act, 1956

  • Hindu Minority and Guardianship Act, 1956

  • Hindu Adoptions and Maintenance Act, 1956

इन सभी कानूनों की परिभाषाओं में “हिंदू” शब्द के दायरे में बौद्धों को स्वतः शामिल कर लिया जाता है, जिसके चलते वे अपने समुदाय-विशेष के रीति–रिवाजों के अनुसार कानून बनाने का अधिकार खो देते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का रुख

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मुद्दा संवैधानिक, सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से बेहद जटिल है, इसलिए इसे सीधे कोर्ट में तय करने के बजाय विधि आयोग द्वारा विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता है। अदालत ने आयोग से कहा है कि याचिकाकर्ताओं के प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखते हुए कानून की व्यापक समीक्षा करे और आवश्यक सिफ़ारिशें केंद्र सरकार को सौंपे।

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