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Karnataka Politics: DK शिवकुमार और CM सिद्धारमैया में सियासी टसल, जानिए किसका पलड़ा भारी

Karnataka Politics: DK शिवकुमार और CM सिद्धारमैया में सियासी टसल, जानिए किसका पलड़ा भारी

बेंगलुरु। कर्नाटक की सियासत में कांग्रेस के दो बड़े दिग्गज—पूर्व अध्यक्ष डीके शिवकुमार और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया—के बीच टकराव लगातार तेज होता जा रहा है। दोनों के समर्थक विधायकों की संख्या और पार्टी के भीतर उनके दबदबे को लेकर लगातार अटकलें लगाई जा रही हैं।

कर्नाटक कांग्रेस में यह टसल मुख्य रूप से आगामी चुनावों और संगठनात्मक सत्ता को लेकर है। डीके शिवकुमार, जो पार्टी में लंबे समय तक संगठनात्मक अनुभव रखते हैं और विधायक समुदाय में अच्छी पकड़ रखते हैं, अपने समर्थक विधायकों के साथ पार्टी में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना चाहते हैं। वहीं, CM सिद्धारमैया, जो राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके हैं, विधानसभा में और पार्टी कार्यकर्ताओं में अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।

पार्टी सूत्रों के अनुसार, डीके शिवकुमार के समर्थक विधायक फिलहाल 45-50 के आसपास हैं। इन विधायकों में ज्यादातर उन क्षेत्रों से हैं, जहां डीके का व्यक्तिगत प्रभाव मजबूत है। इसके विपरीत, सिद्धारमैया के समर्थक विधायकों की संख्या लगभग 40-45 के बीच बताई जा रही है। हालांकि, दोनों पक्षों की संख्या में बदलाव की संभावना हमेशा बनी रहती है, क्योंकि कई विधायक चुनाव और संगठनात्मक निर्णयों के आधार पर अपने पक्ष बदल सकते हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह टसल केवल संख्या की नहीं है, बल्कि इसमें अनुभव, चुनावी रणनीति और पार्टी संगठन में नियंत्रण की भी भूमिका है। डीके शिवकुमार ने हाल ही में कई वरिष्ठ नेताओं और विधायकों के साथ मीटिंग की है, ताकि आगामी विधानसभा चुनाव और संगठनिक मामलों में उनका पक्ष मजबूत हो। वहीं, सिद्धारमैया भी अपने विधायकों और पार्टी के बड़े नेताओं के साथ लगातार संपर्क में हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस टसल का असर सिर्फ कर्नाटक कांग्रेस के अंदर नहीं बल्कि राज्य की राजनीति पर भी पड़ेगा। यदि किसी भी पक्ष को ज्यादा विधायकों का समर्थन मिलता है, तो वह आगामी चुनावों में रणनीति तय करने और उम्मीदवार चयन में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

पार्टी के अंदर यह मामला अभी भी गरम है और दोनों दिग्गजों के समर्थक लगातार बैठकें कर रहे हैं। ऐसे में यह देखना होगा कि आगामी महीनों में किसका पलड़ा भारी होता है। विधायकों का समर्थन, संगठनात्मक पकड़ और जनता के बीच लोकप्रियता—तीनों ही इस सियासी टसल में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।

अंततः, कर्नाटक कांग्रेस के लिए यह महत्वपूर्ण समय है। पार्टी को अंदरूनी टकराव से बचाते हुए आगामी चुनावों की तैयारी करनी होगी। चाहे डीके शिवकुमार का प्रभाव बढ़े या सिद्धारमैया का, पार्टी की सियासी मजबूती और विधायकों का समर्थन ही भविष्य की दिशा तय करेगा।

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