दिल्ली से गुजरात तक अरावली में खनन पर ब्रेक, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केंद्र का सख्त आदेश
दिल्ली से गुजरात तक अरावली में खनन पर ब्रेक, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केंद्र का सख्त आदेश

केंद्र सरकार ने 24 दिसंबर को एक बड़ा और अहम फैसला लेते हुए अरावली पर्वतमाला में नए खनन पट्टे (माइनिंग लीज) देने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। यह आदेश देश के सभी संबंधित राज्यों को जारी किया गया है और गुजरात से लेकर दिल्ली तक फैली पूरी अरावली पर्वत श्रृंखला पर समान रूप से लागू होगा। इसका साफ मतलब है कि राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात—कोई भी राज्य इस फैसले से अलग रुख नहीं अपना सकेगा।
सरकार का मुख्य उद्देश्य अरावली क्षेत्र में वर्षों से चल रहे अवैध और अनियंत्रित खनन पर पूरी तरह रोक लगाना है। लंबे समय से खनन माफिया इस क्षेत्र में नियमों को ताक पर रखकर खनन कर रहे थे, जिससे न केवल पहाड़ों की संरचना कमजोर हुई बल्कि पर्यावरण, जलवायु और जैव विविधता को भी भारी नुकसान पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से शुरू हुआ मामला
इस पूरे मामले की शुरुआत 20 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट के एक अहम फैसले से हुई। तत्कालीन चीफ जस्टिस बी.आर. गवई ने अपने अंतिम निर्णय में स्पष्ट कहा कि अरावली क्षेत्र में अब नए सिरे से खनन के लिए कोई लीज जारी नहीं की जाएगी। इस फैसले को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम माना गया।
हालांकि, इस आदेश के साथ सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय की एक तकनीकी समिति की रिपोर्ट को भी स्वीकार किया, जिसमें अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा तय की गई थी। यहीं से विवाद की शुरुआत हुई।
अरावली की परिभाषा क्यों बनी विवाद की वजह
बीते एक दशक से फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) अरावली की पहचान के लिए 3 डिग्री ढलान के मानक का इस्तेमाल करता रहा है। लेकिन 2024 में बनी तकनीकी समिति ने इसे बदलकर 4.57 डिग्री ढलान कर दिया और ऊंचाई की सीमा 30 मीटर तय की।
इसके बाद जब केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में नई परिभाषा पेश की, तो ऊंचाई की सीमा बढ़ाकर 100 मीटर कर दी गई। यानी अब वही इलाका अरावली माना जाएगा, जो अपने आसपास की जमीन से 100 मीटर या उससे ज्यादा ऊंचा हो। विशेषज्ञों का मानना है कि इस नए मानक से अरावली का करीब 90% हिस्सा पहचान से बाहर हो सकता है।
अरावली क्यों है इतनी जरूरी
अरावली पर्वत श्रृंखला करीब 2 करोड़ साल पुरानी मानी जाती है और यह सदियों से उत्तर-पश्चिम भारत को रेगिस्तान बनने से बचाने में ढाल की तरह काम करती रही है। मध्य और उत्तर-पश्चिमी भारत की जलवायु, भूजल स्तर और इकोलॉजी में इसका बड़ा योगदान है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अरावली के बड़े हिस्से को खनन और निर्माण के लिए खोल दिया गया, तो इसका असर दिल्ली-NCR से लेकर राजस्थान और गुजरात तक की जलवायु पर पड़ेगा। यही वजह है कि इस पर्वतमाला को संरक्षित रखना बेहद जरूरी माना जाता है।





