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इंदौर में दूषित पानी ने ली 6 महीने के मासूम की जान, मां का दर्द छलका, नगर निगम पर लापरवाही के गंभीर आरोप

इंदौर। इंदौर में दूषित पानी से हो रही मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। ताजा मामला नई बस्ती स्थित मराठी मोहल्ला (भागीरथपुरा क्षेत्र) से सामने आया है, जहां दूषित पानी पीने से 6 महीने के मासूम बच्चे की मौत हो गई। इस हृदयविदारक घटना के बाद परिजनों ने नगर निगम पर गंभीर लापरवाही का आरोप लगाया है।

मासूम की मां साधना साहू सदमे में हैं और रो-रोकर बेहाल हैं। उन्होंने बताया कि उनके बेटे को उल्टी-दस्त की शिकायत हुई थी, जिसके बाद उसे पहले सरकारी अस्पताल और फिर अपोलो अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

“10 साल बाद बेटा हुआ था, सब छिन गया”

साधना साहू ने टूटती आवाज में कहा,

“मेरा बच्चा चला गया। 10 साल बाद मुझे बेटा हुआ था। घर का खिलौना था, दादा-दादी का सहारा था। सोचा था बड़ा होकर हम सबका सहारा बनेगा, लेकिन दूषित पानी ने उससे पहले ही छीन लिया।”

उन्होंने बताया कि बच्चे को ब्रेस्ट फीडिंग से पर्याप्त दूध नहीं मिल पा रहा था, इसलिए बाहर का गाढ़ा दूध पानी मिलाकर पिलाया जा रहा था। वही पानी दूषित निकला और मासूम की जान ले ली।

बेटी भी बीमार, परिवार में डर का माहौल

साधना ने बताया कि उनकी 10 साल की बेटी किंचन को भी अब पेट दर्द की शिकायत हो रही है। आशंका है कि वह भी दूषित पानी की चपेट में आ चुकी है। परिवार में डर और गुस्से का माहौल है। उनका कहना है कि यदि समय रहते पानी की शिकायतों पर ध्यान दिया जाता, तो यह हादसा टल सकता था।

यह पूरा मामला भागीरथपुरा जल संकट से जुड़ा

यह घटना इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में फैले दूषित पानी संकट का हिस्सा है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, अब तक 27 अस्पतालों में 149 मरीज भर्ती हैं। कई लोगों की हालत गंभीर बताई जा रही है।

सरकार एक्शन में, निगम अधिकारियों पर गिरी गाज

मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
नगर निगम ने जोनल अधिकारी और सहायक यंत्री को निलंबित कर दिया है। साथ ही, मृतकों के परिजनों को 2-2 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की गई है।

स्वास्थ्य विभाग ने प्रभावित क्षेत्रों में क्लोरीनेशन बढ़ाने, पानी की लाइनों की जांच और टैंकरों से शुद्ध पेयजल सप्लाई शुरू कर दी है।

हालांकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कार्रवाई बहुत देर से हुई। सवाल यह है कि अगर शिकायतों पर पहले ध्यान दिया जाता, तो क्या आज एक मां की गोद सूनी होती?

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