चीनी के दाम ₹70 तक क्यों पहुंचे? खड़गे के सवाल और सरकार का जवाब
भारत में sugar price hike India को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। कई बाजारों में चीनी की खुदरा कीमत ₹65-70 प्रति किलो तक पहुंचने की रिपोर्ट है। वहीं, सरकार के आंकड़ों में औसत खुदरा कीमत 20 जुलाई के ₹48.18 से बढ़कर 20 अगस्त को ₹55.70 प्रति किलो हुई है।
इस बीच कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने चीनी की कीमत, घटते स्टॉक और विदेश से आयात को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर, केंद्र ने कहा है कि कीमत बढ़ने के लिए एथेनॉल उत्पादन को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है।
चीनी की कीमत में कितना उछाल आया?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 20 जुलाई को औसत खुदरा चीनी कीमत ₹48.18 प्रति किलो थी। इसके बाद 20 अगस्त को यह ₹55.70 प्रति किलो पहुंच गई। यानी करीब एक महीने में लगभग 16% की बढ़ोतरी हुई।
हालांकि, कई स्थानीय बाजारों में कीमत इससे काफी ज्यादा बताई जा रही है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने कोलकाता में कीमत ₹70 प्रति किलो तक पहुंचने की रिपोर्ट की है।
इसके अलावा, थोक बाजार में भी तेज बढ़ोतरी देखी गई है। कोल्हापुर में अगस्त की शुरुआत से थोक कीमत करीब 20% बढ़कर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची।
खड़गे ने सरकार से क्या सवाल किए?
वहीं, मल्लिकार्जुन खड़गे ने शनिवार को चीनी की बढ़ती कीमतों और स्टॉक को लेकर केंद्र पर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि भारत जैसे बड़े चीनी उत्पादक देश को विदेश से चीनी क्यों मंगानी पड़ रही है।
खड़गे ने एथेनॉल नीति का मुद्दा भी उठाया। उनका तर्क है कि यदि गन्ने का एक हिस्सा एथेनॉल के लिए इस्तेमाल हो रहा है, तो चीनी की उपलब्धता पर उसका असर पड़ सकता है।
हालांकि, यह विपक्ष का राजनीतिक दावा है। इसे स्थापित तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।
सरकार बोली- एथेनॉल कीमत बढ़ने की वजह नहीं
इसके बाद केंद्र सरकार ने एथेनॉल को कीमत बढ़ने की मुख्य वजह मानने से इनकार किया। खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के अनुसार, चीनी के दाम बढ़ने के पीछे कई कारण हैं।
इनमें घरेलू उत्पादन में कमी, त्योहारों से पहले बढ़ी मांग, मौसम से फसल को नुकसान, वैश्विक सप्लाई दबाव और कुछ कारोबारियों द्वारा जमाखोरी शामिल हैं।
सरकार के अनुसार एथेनॉल के लिए डायवर्ट की जाने वाली चीनी की हिस्सेदारी 2022-23 के करीब 12% से घटकर 2025-26 में लगभग 9% रह गई है। साथ ही, देश में बनने वाले एथेनॉल का बड़ा हिस्सा अब अनाज, खासकर मक्का, से आता है।
भारत में चीनी उत्पादन कितना घटा?
इसी बीच, इस सीजन के उत्पादन अनुमान में भी बड़ी कमी आई है। सरकार के अनुसार 2025-26 सीजन में चीनी उत्पादन करीब 306 लाख टन रहने का अनुमान है। शुरुआती अनुमान 343 लाख टन था।
सरकार ने उत्पादन में कमी के लिए गन्ने की फसल को हुए नुकसान का भी उल्लेख किया है। रेड रॉट, टॉप बोरर और ज्यादा बारिश जैसी समस्याओं से उत्पादन प्रभावित हुआ।
नतीजतन, बाजार में उपलब्ध स्टॉक पर दबाव बढ़ा है। यही दबाव कीमतों में तेजी का एक प्रमुख कारण माना जा रहा है।
सरकार ने 10 लाख टन चीनी आयात को मंजूरी क्यों दी?
इसके बावजूद, सरकार ने घरेलू बाजार में सप्लाई बढ़ाने के लिए 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। यह अनुमति 31 अक्टूबर 2026 तक है।
भारत में सामान्य तौर पर चीनी आयात पर भारी शुल्क लागू होता है। इसलिए करीब एक दशक बाद इस तरह का कदम बाजार के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इसके अलावा, कुछ पोर्ट आधारित रिफाइनरियों को घरेलू बाजार में चीनी बेचने की अनुमति से तत्काल अतिरिक्त सप्लाई आने की उम्मीद है। Reuters के अनुसार इससे शुरुआती तौर पर करीब 3 लाख टन चीनी बाजार में आ सकती है।
क्या अक्टूबर से चीनी के दाम कम हो सकते हैं?
आगे नजर अक्टूबर पर है। सरकार ने मिलों को नए पेराई सीजन की शुरुआत करीब 15 अक्टूबर से करने की सलाह दी है। सरकार को उम्मीद है कि अक्टूबर में अतिरिक्त उत्पादन बाजार में उपलब्ध होगा।
हालांकि, कीमतों में गिरावट कितनी होगी, यह कई कारकों पर निर्भर करेगा। मांग, आयात की गति, मिलों का उत्पादन और बाजार में स्टॉक इसकी दिशा तय करेंगे।
वहीं, त्योहारों के दौरान चीनी की मांग बढ़ने की संभावना है। इसलिए अक्टूबर तक कीमतों पर दबाव पूरी तरह खत्म होगा, यह अभी कहना जल्दबाजी होगी।
सरकार ने स्टॉक लिमिट भी लगाई
साथ ही, जमाखोरी और कृत्रिम कमी रोकने के लिए सरकार ने स्टॉक लिमिट लागू की है। डीलर्स के लिए 400 टन की सीमा बताई गई है।
1 सितंबर से बड़े थोक खरीदार 15 दिनों की खपत से ज्यादा चीनी रखने में सक्षम नहीं होंगे। सरकार ने मिलों के स्टॉक की जांच के लिए केंद्रीय और राज्य अधिकारियों की संयुक्त टीमों को भी लगाया है।
इसका उद्देश्य बाजार में उपलब्धता बनाए रखना और कीमतों पर अतिरिक्त दबाव रोकना है।
क्या एथेनॉल नीति सच में चीनी महंगी कर रही है?
यह इस पूरी बहस का सबसे अहम सवाल है। विपक्ष एथेनॉल नीति पर सवाल उठा रहा है। हालांकि, सरकार इससे इनकार कर रही है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक एथेनॉल के लिए डायवर्ट होने वाली चीनी की हिस्सेदारी पहले की तुलना में कम हुई है। दूसरी ओर, इस साल चीनी उत्पादन का अनुमान भी शुरुआती अनुमान से काफी नीचे है।
इसलिए फिलहाल उपलब्ध आंकड़े केवल एथेनॉल को कीमत बढ़ने की एकमात्र वजह साबित नहीं करते। कीमतों में तेजी के पीछे उत्पादन, मांग, मौसम और वैश्विक बाजार जैसे कई कारक हैं।
आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
चीनी रोजमर्रा की जरूरत की वस्तु है। इसलिए कीमत में तेज बढ़ोतरी का असर घरेलू बजट पर पड़ सकता है।
इसके अलावा, मिठाई, बेकरी, पेय और खाद्य प्रसंस्करण जैसे कारोबारों की लागत भी प्रभावित हो सकती है। त्योहारों से पहले यह असर ज्यादा दिखाई दे सकता है।
इस बीच, सरकार के आयात और स्टॉक लिमिट वाले फैसलों का असर बाजार में आने वाले हफ्तों में दिखाई देना शुरू हो सकता है।
Sugar Price Hike India: आगे क्या देखना होगा?
अब तीन संकेत सबसे महत्वपूर्ण होंगे।
पहला, आयातित कच्ची चीनी बाजार में कितनी तेजी से पहुंचती है।
दूसरा, अक्टूबर में नई पेराई से कितना उत्पादन आता है।
तीसरा, त्योहारों के दौरान खुदरा मांग कितनी बढ़ती है।
इन तीनों के बीच संतुलन ही आने वाले महीनों में चीनी की कीमत तय करेगा।
Bottom Line
चीनी की कीमतों में तेज बढ़ोतरी ने सरकार और विपक्ष के बीच नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। खड़गे ने आयात और एथेनॉल नीति पर सवाल उठाए हैं। वहीं, सरकार का कहना है कि मौजूदा तेजी के पीछे कम उत्पादन, मौसम, त्योहारी मांग और वैश्विक सप्लाई दबाव जैसे कई कारण हैं।
फिलहाल सरकार ने 10 लाख टन शुल्क-मुक्त कच्ची चीनी आयात करने का फैसला किया है। साथ ही, स्टॉक लिमिट और निगरानी के कदम उठाए गए हैं।

