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इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से 8 मौतों पर हाईकोर्ट सख्त, 1100 से अधिक बीमार, आज जनहित याचिकाओं पर सुनवाई

इंदौर। इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी से हुई आठ लोगों की मौत के मामले ने अब गंभीर संवैधानिक मोड़ ले लिया है। इस जनस्वास्थ्य संकट को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में दो जनहित याचिकाएं (PIL) दाखिल की गई हैं। खास बात यह है कि इन याचिकाओं पर आज ही सुनवाई प्रस्तावित है।

भागीरथपुरा क्षेत्र में पिछले कई दिनों से गंदे पानी की सप्लाई के कारण हालात बेकाबू हो गए। प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार, अब तक 1100 से अधिक लोग बीमार हो चुके हैं, जिनमें से कई की हालत गंभीर बताई जा रही है। बड़ी संख्या में मरीजों का इलाज विभिन्न अस्पतालों में जारी है।

नगर निगम की लापरवाही आई सामने

मामले की गंभीरता को देखते हुए नगर निगम ने जोनल ऑफिसर (ZO), सहायक यंत्री और उपयंत्री के खिलाफ कार्रवाई की है। हालांकि, स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह कार्रवाई बहुत देर से की गई, क्योंकि उन्होंने पहले ही दूषित पानी की शिकायतें अधिकारियों तक पहुंचाई थीं, लेकिन समय रहते कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

पानी सप्लाई सिस्टम में गंभीर खामियां

जानकारी के मुताबिक, भागीरथपुरा के वार्ड क्रमांक 11 में करीब 7 हजार नर्मदा जल कनेक्शन हैं। इलाके में पानी की सप्लाई 1997 में बनी भागीरथपुरा पानी की टंकी से होती है। यह टंकी नर्मदा फेज-1 और फेज-2 की पाइपलाइन से भरी जाती है।

रिकॉर्ड के अनुसार, 9 सितंबर को रामकी कंपनी के कर्मचारियों द्वारा टंकी की सफाई की गई थी। इसके बाद दूषित पानी से लोगों के बीमार होने की शिकायतें बढ़ीं, जिसके चलते 28 दिसंबर को दोबारा सफाई कराई गई। बावजूद इसके, हालात नहीं सुधरे।

शौचालय बना संक्रमण की जड़

जांच में एक गंभीर तथ्य सामने आया है। वर्ष 2003 में टंकी के पास बनी पुलिस चौकी के समीप नर्मदा लाइन के ऊपर शौचालय का निर्माण कर दिया गया था। आशंका है कि इसी कारण पाइपलाइन में गंदगी पहुंची और पानी दूषित हुआ, जिससे यह भयावह स्थिति बनी।

हाईकोर्ट से न्याय की उम्मीद

जनहित याचिकाओं में मांग की गई है कि दोषी अधिकारियों और एजेंसियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई, मृतकों के परिजनों को मुआवजा और भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों, इसके लिए स्थायी समाधान किया जाए।

भागीरथपुरा की यह त्रासदी न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही का उदाहरण है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि जल जैसी बुनियादी सुविधा में थोड़ी सी चूक भी कितनी जानलेवा साबित हो सकती है। अब पूरे प्रदेश की निगाहें हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं।

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