मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 27 प्रतिशत OBC आरक्षण वाले कानून को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने इस कानून को असंवैधानिक बताया है। जबलपुर में जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने शुक्रवार को 159 पन्नों का फैसला सुनाया। इसके साथ ही सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में OBC आरक्षण 14 प्रतिशत पर बहाल हो गया है।
यह कानून 2019 में कमल नाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने बनाया था। पहले 8 मार्च 2019 को अध्यादेश जारी हुआ था। फिर 14 अगस्त 2019 को इसे कानून का रूप दे दिया गया।
इस कानून के खिलाफ 90 से अधिक याचिकाएं दायर हुई थीं। प्रमुख याचिका अशीता दुबे और अन्य बनाम मध्य प्रदेश सरकार के नाम से थी।
कोर्ट ने कहा कि 50 प्रतिशत की सीमा से अधिक आरक्षण जायज नहीं है। इसके लिए कोई असाधारण या आपात परिस्थिति साबित नहीं हुई। फैसले में इंद्रा साहनी और जैश्री लक्ष्मणराव पाटिल के मामलों का हवाला दिया गया है। कोर्ट ने यह भी माना कि संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत OBC वर्ग का प्रतिनिधित्व पहले से पर्याप्त है।
रुकी भर्तियों पर बड़ा आदेश
अदालत ने MPPSC, MP कर्मचारी चयन मंडल (पहले व्यापम) और अन्य भर्ती एजेंसियों को सख्त निर्देश दिए हैं। 29 सितंबर 2022 से 87:13 फॉर्मूले के तहत 13 प्रतिशत पद रोके गए थे।
इसलिए अदालत ने इन्हें तीन महीने के अंदर भरने का आदेश दिया है। ये पद अनारक्षित श्रेणी की चयन सूची से भरे जाएंगे। हाल ही में घोषित MP पुलिस ड्राइवर भर्ती जैसी प्रक्रियाओं पर भी इस फैसले का असर पड़ सकता है।
इस मामले की अंतिम सुनवाई 5 अगस्त 2026 को पूरी हुई थी और फैसला सुरक्षित रखा गया था। सरकार की ओर से एडवोकेट जनरल प्रशांत सिंह ने पैरवी की। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता धीरज तिवारी पेश हुए।
फैसले पर सियासी प्रतिक्रिया भी सामने आई है। IBC24 की रिपोर्ट के मुताबिक अरुण यादव ने फैसले पर प्रतिक्रिया दी है।
पूर्व केंद्रीय मंत्री और पूर्व MP कांग्रेस अध्यक्ष ने बयान दिया है। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार ने पिछड़ा वर्ग के साथ फिर अन्याय किया। उनका आरोप है कि सरकार अदालत में 27 प्रतिशत आरक्षण के पक्ष में ठोस आंकड़े पेश नहीं कर सकी।
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