Supreme Court ने गुरुवार को Yes Bank के ₹8,415 करोड़ के Additional Tier-1 (AT1) बॉन्ड राइट-ऑफ को अवैध और मनमाना करार दिया। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने इस मामले में Bombay High Court के फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया। अदालत ने Yes Bank, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और केंद्र सरकार की अपीलें खारिज कर दीं और हाई कोर्ट के फैसले पर लगी रोक भी हटा दी।
फैसले की खबर पर गुरुवार को Yes Bank के शेयर 13 से 20 प्रतिशत तक टूटकर ₹18.12 पर बंद हुए, जबकि बाजार में करीब 2 प्रतिशत की तेज़ी थी। अब बैंक को इन विवादित बॉन्डों से जुड़ी देनदारियों का सामना करना पड़ सकता है।
यह विवाद मार्च 2020 का है, जब Yes Bank की हालत बिगड़ने पर RBI ने 5 मार्च को बैंक पर रोक लगाई थी। इसके बाद SBI समेत कई बड़े बैंकों ने पूंजी लगाकर Yes Bank को बचाया। पुनर्गठन के दौरान बैंक के प्रशासक ने 14 मार्च 2020 को ₹8,415 करोड़ के AT1 बॉन्ड शून्य कर दिए थे। इनमें दिसंबर 2016 के ₹3,000 करोड़ और अक्टूबर 2017 के ₹5,415 करोड़ शामिल थे।
क्या था पूरा मामला
AT1 बॉन्ड ऐसे स्थायी ऋण-पत्र होते हैं जिनसे बैंक अपनी पूंजी मज़बूत करते हैं। इन पर ब्याज ज़्यादा मिलता है, लेकिन संकट में निवेशकों का पूरा पैसा डूबने का जोखिम रहता है। बॉन्डधारकों की ओर से Axis Trustee Services समेत कई निवेशकों ने इस राइट-ऑफ को चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि बैंक के बचने के बावजूद उनका निवेश गलत तरीके से खत्म किया गया, जबकि शेयरधारकों पर सिर्फ तीन साल का लॉक-इन लगा था।
Bombay High Court ने 20 जनवरी 2023 को कहा था कि यह राइट-ऑफ अंतिम पुनर्गठन योजना का हिस्सा नहीं था और प्रशासक ने अपने अधिकार से बाहर जाकर यह कदम उठाया था। केंद्र सरकार का तर्क था कि 2 लाख से ज़्यादा जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा के लिए यह ज़रूरी था, लेकिन अदालत ने इसे स्वीकार नहीं किया।
Supreme Court के फैसले के मायने
Supreme Court ने कहा कि बॉन्डों को “पुनर्गठन से पहले” शून्य करने की शर्त का मतलब योजना लागू होने से पहले था, न कि उसके बाद। अदालत ने सवाल उठाया कि जब अंतिम योजना से राइट-ऑफ का प्रावधान हटा दिया गया था, तो क्या नियामक के तौर पर RBI को इसके नतीजों की जानकारी नहीं थी।
यह फैसला उन हज़ारों बॉन्डधारकों के लिए राहत है, जिनका आरोप था कि उन्हें ये बॉन्ड गलत तरीके से बेचे गए थे। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इससे नियामकीय अनिश्चितता पैदा हो सकती है। गौरतलब है कि जापान के Sumitomo Mitsui Banking Corporation (SMBC) ने पिछले साल Yes Bank में 20 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदी थी और वह अब बैंक का सबसे बड़ा शेयरधारक है। छह साल से चल रही इस कानूनी लड़ाई का अब अंतिम अध्याय लिखा जा चुका है।
