क्या RSS की तरह रणनीति बना रहीं मायावती? MY फॉर्मूला का काट तैयार, 2027 में BJP नहीं बल्कि अखिलेश पर सीधा निशाना
क्या RSS की तरह रणनीति बना रहीं मायावती? MY फॉर्मूला का काट तैयार, 2027 में BJP नहीं बल्कि अखिलेश पर सीधा निशाना

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के चुनाव से पहले कई नए समीकरण बन रहे हैं, और सबसे बड़ा बदलाव दिख रहा है बहुजन समाज पार्टी (BSP) की मुखिया मायावती की रणनीति में। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मायावती अब सिर्फ परंपरागत दलित वोट बैंक पर निर्भर नहीं रहना चाहतीं, बल्कि वे RSS की तरह बूथ-लेवल पर मजबूत नेटवर्क तैयार करने की कोशिश कर रही हैं। वहीं उनका बड़ा निशाना भाजपा नहीं, बल्कि अखिलेश यादव का MY (मुस्लिम–यादव) फॉर्मूला है, जिसने 2022 और 2024 के चुनावों में SP को मजबूती दी।
RSS जैसी जमीनी रणनीति क्यों?
बीते कुछ महीनों में BSP की गतिविधियों से साफ संकेत मिल रहा है कि मायावती पार्टी संगठन को फिर से खड़ा करना चाहती हैं। जिला इकाइयों का पुनर्गठन, सेक्टर प्रभारियों की तैनाती और बूथवार सामाजिक समीकरणों की समीक्षा— यह सब RSS की तरह ‘डोर-टू-डोर कैडर नेटवर्क’ की ओर इशारा करता है।
दरअसल, मायावती ने 2017 और 2022 की करारी हार के बाद महसूस किया कि बिना मजबूत ग्राउंड कैडर के दलित–अल्पसंख्यक समीकरण टिक नहीं सकता।
2027 में BJP नहीं, SP मुख्य टारगेट?
दिलचस्प बात यह है कि मायावती की बयानबाजी और रणनीति से साफ है कि 2027 में वे भाजपा से ज्यादा SP और अखिलेश यादव को चुनौती देने की तैयारी में हैं।
इसका कारण यह है कि पिछले दो चुनावों में दलितों का एक बड़ा हिस्सा BJP की तरफ खिंच गया, और मुसलमानों का वोट SP के MY समीकरण में फंसकर लगभग एकमुश्त चला गया।
मायावती समझ चुकी हैं कि भाजपा का मुकाबला तभी संभव है जब पहले SP के वोट बैंक में सेंध लगे। इसलिए वे मुस्लिम वोटरों को यह संदेश दे रही हैं कि:
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SP सिर्फ यादवों की पार्टी है
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मुसलमानों को वास्तविक प्रतिनिधित्व BSP दे सकती है
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कानून-व्यवस्था और सुरक्षा के मुद्दे हों तो BSP बेहतर विकल्प है

MY फॉर्मूला का ‘काट’ कैसे तैयार हो रहा है?
मायावती मुस्लिम चेहरों को मजबूत तरीके से सामने ला रही हैं। हाल ही में कई जिलों में मुस्लिम नेताओं को अहम जिम्मेदारियाँ दी गईं। BSP की रणनीति है कि MY समीकरण को DMY (दलित–मुस्लिम–यादव में विभाजन) में बदला जाए।
वे यादव वोट बैंक को भी सीधे संबोधित कर रही हैं, यह बताते हुए कि SP में यादवों का भी सिर्फ एक ही परिवार फायदा उठाता है, जबकि BSP में “समान अवसर” है।
‘सोशल इंजीनियरिंग’ मॉडल की वापसी
मायावती 2007 की तरह की सोशल इंजीनियरिंग का मॉडल फिर से एक्टिव करने की तैयारी में हैं— इस बार दलित + ओबीसी + मुस्लिम + गैर-यादव पिछड़ों के गठजोड़ पर ज्यादा फोकस है।
यह मॉडल SP की सबसे कमजोर कड़ी को टारगेट करता है:
SP यादव–मुस्लिम केंद्रित है, जबकि BSP अधिक व्यापक सामाजिक आधार का दावा करती है।
क्या यह रणनीति सफल होगी?
यह इस बात पर निर्भर करेगा कि BSP कितनी तेजी से अपने संगठन को जमीनी स्तर पर सक्रिय कर पाती है।
यदि मायावती अपने कैडर को दोबारा मजबूत कर लेती हैं और मुस्लिम–गैर यादव वोटर्स को जोड़ने में सफल होती हैं, तो 2027 का चुनाव त्रिकोणीय मुकाबला बन सकता है।
एक बात साफ है— मायावती अब ‘कम बयान, ज्यादा संगठन’ की नीति पर हैं, और यह 2027 की यूपी राजनीति को पूरी तरह बदल सकता है।





