इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों के मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने बड़ा कदम उठाया है। जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने सेवानिवृत्त जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में एकल सदस्यीय जांच आयोग गठित करने का आदेश दिया है। यह आदेश मंगलवार को कई जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के बाद जारी हुआ। याचिकाओं में नगर निकायों की लापरवाही के कारण फैली बीमारी और मौतों का मुद्दा उठाया गया था।
2 महीने में सौंपनी होगी रिपोर्ट
आयोग को 2 महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी। आयोग के पास सिविल कोर्ट जैसे अधिकार होंगे। वह गवाहों को समन भेज सकेगा, सरकारी विभागों, अस्पतालों और नगर निकायों के रिकॉर्ड तलब कर सकेगा, लैब टेस्ट के आदेश दे सकेगा और मौके पर जाकर निरीक्षण भी कर सकेगा। जिला प्रशासन, इंदौर नगर निगम, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग और मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को पूरा सहयोग देने का निर्देश दिया गया है। राज्य सरकार आयोग को दफ्तर, स्टाफ और लॉजिस्टिक सहायता मुहैया कराएगी।
जांच के दायरे में कई अहम सवाल होंगे। पानी में सीवेज कैसे मिला, पाइपलाइन क्षतिग्रस्त थी या नहीं, असल में कितनी मौतें हुईं और बीमारी की प्रकृति क्या थी — इन सभी बिंदुओं की जांच होगी। इसके अलावा इलाज की व्यवस्था कितनी पर्याप्त रही, अफसरों की जवाबदेही कैसे तय होगी और पीड़ितों, खासकर कमजोर वर्गों को मुआवजे की क्या गाइडलाइन बनेगी, यह भी आयोग देखेगा।
सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से पेश मौत ऑडिट रिपोर्ट पर भी सवाल उठे। डॉक्टरों की समिति ने 23 में से 16 मौतों को दूषित पानी से जुड़ा माना, जबकि बाकी को अनिर्णीत बताया गया। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि निर्णीत और अनिर्णीत मामलों में एक जैसी टिप्पणी लिखी गई है, जो रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करती है।
अदालत ने साफ कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत साफ पानी का अधिकार जीवन के अधिकार का हिस्सा है। इसलिए इस मामले में स्वतंत्र जांच जरूरी है। मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर को होगी, जब आयोग के गठन की प्रगति पर भी नजर रखी जाएगी।

