दिल्ली की एक अदालत ने फरवरी 2020 के नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली दंगों में बाबू नाम के व्यक्ति की हत्या के मामले में आठों आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने सभी को “संदेह का लाभ” (benefit of doubt) दिया। हालांकि इनमें से सात आरोपियों पर निषेधाज्ञा आदेशों का उल्लंघन करने का आरोप कायम रखा गया है और उन्हें इस धारा में दोषी ठहराया गया है।
कौन-कौन बरी, किस पर क्या आरोप था
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (ASJ) प्रवीन सिंह ने सचिन गुप्ता उर्फ मोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया। वहीं कुलदीप, हरजीत सिंह उर्फ हैप्पी, अजय उर्फ राहुल, सचिन रस्तोगी, भारत भूषण, संदीप उर्फ संजीव और धर्मेंद्र उर्फ धाम — इन सातों को IPC की धारा 148/149 (दंगा, गैरकानूनी जमावड़ा), 302/149 (हत्या) और 153A/149 (समुदायों में दुश्मनी फैलाना) के आरोपों से बरी किया गया। लेकिन इन सातों को IPC की धारा 188 (निषेधाज्ञा आदेश की अवज्ञा) के तहत दोषी ठहराया गया है।
यह मामला खजूरी खास थाने में फरवरी 2020 में दर्ज हुआ था। आरोप था कि 25 फरवरी 2020 को खजूरी चौक पर भीड़ ने बाबू पर हमला किया, जिससे उनकी मौत हो गई। बाबू के भाई पप्पू की शिकायत पर FIR दर्ज की गई थी।
कोर्ट ने क्यों दिया संदेह का लाभ
अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष के सिर्फ तीन पुलिस गवाहों ने आरोपियों की पहचान खजूरी चौक पर दंगाई भीड़ के सदस्य के रूप में की थी। लेकिन इनमें से दो गवाहों ने यह बयान नहीं दिया कि उन्होंने मृतक को भीड़ द्वारा पीटते हुए देखा था। एक गवाह ने दावा किया था कि घायल कांस्टेबल अमित को लेकर हेजवार अस्पताल जाने के बाद खजूरी चौक लौटने पर उन्होंने कुछ लोगों को लाठियों से एक व्यक्ति को पीटते देखा — लेकिन कांस्टेबल भूपेंद्र ने अपने बयान में ऐसी किसी घटना का जिक्र नहीं किया।
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि हत्या के आरोप के समर्थन में गवाहों के बयान विश्वसनीय और पर्याप्त नहीं हैं। इसी आधार पर आठों को हत्या, दंगा और सामुदायिक दुश्मनी के गंभीर आरोपों से बरी कर दिया गया। यह फैसला 2020 के दंगों से जुड़े मुकदमों की लंबी कतार में एक और अहम अध्याय है।
सूत्र: The Economic Times
