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DPDP Act पर Supreme Court ने केंद्र को नोटिस जारी किया

Dainik R Times
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DPDP Act Supreme Court में मंगलवार को बड़ी सुनवाई हुई। तीन जजों की पीठ ने डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। पीठ की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने की। उनके साथ न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना भी पीठ में थे। अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 17 नवंबर की तारीख तय की है।

याचिका 6 अक्टूबर को दाखिल की गई थी। इसे 21 मीडिया संस्थानों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन ने दाखिल किया है। इनमें नेटवर्क18, एनडीटीवी, इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स इंटरनेट शामिल हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी गोराडिया दीवान ने दलीलें रखीं। उन्होंने कहा कि यह पारंपरिक मीडिया की पहली व्यापक याचिका है। खबरों से जुड़ी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार याचिका करीब 698 पन्नों की है। संगठन का कहना है कि उसे अगस्त में सरकार से मौखिक भरोसा मिला था। हालांकि लिखित में पत्रकारिता की छूट नहीं दी गई। इसलिए संगठन अदालत पहुंचा है।

DPDP Act Supreme Court: प्रकाशकों को किस बात की चिंता है?

प्रकाशकों का कहना है कि कानून में पत्रकारिता के लिए कोई स्पष्ट छूट नहीं है। इसलिए जांच के दौरान किसी व्यक्ति की सहमति लेना मुश्किल हो सकता है। याचिका के अनुसार जांच के विषय को पहले बताने से सबूत नष्ट हो सकते हैं। गवाहों को डराया भी जा सकता है। इसके अलावा सहमति वापस लेने और डेटा मिटाने का अधिकार भी चिंता का कारण है। प्रकाशकों को डर है कि इससे छपी खबरों को हटाने की मांग उठ सकती है। उनका कहना है कि जांच के लिए सहमति मांगना खबर की अवधारणा को ही खत्म कर देगा।

याचिका में सरकार की जानकारी मांगने की शक्ति पर भी सवाल उठाया गया है। प्रकाशकों का कहना है कि इससे गोपनीय स्रोतों की पहचान उजागर हो सकती है। इससे भ्रष्टाचार और गलत कामों की जानकारी देने वाले लोग डर सकते हैं। संगठन ने यूरोपीय संघ, सिंगापुर और ब्रिटेन का उदाहरण दिया है। वहां निजता कानूनों में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट सुरक्षा मौजूद है। भारत के कानून में ऐसी स्पष्ट व्यवस्था नहीं है, ऐसा याचिका में कहा गया है।

याचिका में सूचना के अधिकार से जुड़ा बदलाव भी चुनौती दी गई है। कानून की धारा 44(3) ने सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(j) को बदला है। पहले जनहित से जुड़ी निजी जानकारी देने का संतुलन संभव था। अब इस प्रावधान के हटने से पारदर्शिता कमजोर होने का आरोप है। अदालत ने फिलहाल सिर्फ नोटिस जारी किया है। कानून पर रोक का कोई आदेश सामने नहीं आया है। सरकार पहले कह चुकी है कि यह ढांचा नागरिकों की निजता की रक्षा के लिए है।

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने संतुलन की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मीडिया ही बता सकता है कि दुरुपयोग कैसे रोका जाए। साथ ही निर्दोष नागरिकों के अधिकारों का संतुलन भी जरूरी है। विवादित प्रावधान मई 2027 से लागू होने हैं। इसलिए 17 नवंबर की सुनवाई पर सबकी नजर रहेगी। अदालत का फैसला पत्रकारिता और निजता दोनों के लिए अहम होगा।

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