भारतीय नौसेना को जल्द ही आठ नए स्टील्थ युद्धपोत मिलने जा रहे हैं। इन युद्धपोतों को Navy Corvettes कहा जाएगा। कैबिनेट की सुरक्षा समिति ने इस बड़े रक्षा सौदे को मंजूरी दे दी है। इस परियोजना पर 40,000 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च होंगे। नए युद्धपोत पूरी तरह भारतीय डिजाइन पर बनेंगे।
GRSE और Goa Shipyard बनाएंगे आठों युद्धपोत
आठों युद्धपोत दो सरकारी शिपयार्ड में बनेंगे। कोलकाता की Garden Reach Shipbuilders and Engineers पांच युद्धपोत बनाएगी। गोवा शिपयार्ड लिमिटेड बाकी तीन युद्धपोतों का निर्माण करेगी। दोनों शिपयार्ड के साथ अनुबंध अगले कुछ दिनों में होगा। अनुबंध के एक साल के भीतर पहले युद्धपोत का निर्माण शुरू होगा।
2,000 टन के युद्धपोत, 30 नॉट की रफ्तार
हर युद्धपोत का वजन करीब 2,000 टन होगा। इसकी अधिकतम रफ्तार करीब 30 नॉट होगी। नौसेना ने इन युद्धपोतों का स्टील्थ डिजाइन खुद तैयार किया है। ये युद्धपोत पनडुब्बी रोधी और हवाई हमले से बचाव जैसे काम करेंगे। परियोजना में 70 फीसदी से ज्यादा स्वदेशी सामग्री इस्तेमाल होगी। ये युद्धपोत नौसेना के चार कामोर्ता श्रेणी के युद्धपोतों को मजबूत साथ देंगे। समुद्र में निगरानी और गश्त की क्षमता भी इनसे बढ़ेगी।
2022 से चल रही थी प्रक्रिया
इस परियोजना की शुरुआत जून 2022 में हुई थी। तब रक्षा अधिग्रहण परिषद ने करीब 36,000 करोड़ रुपये की लागत को मंजूरी दी थी। इसके बाद बोली और बातचीत की लंबी प्रक्रिया चली। अब सुरक्षा समिति की मंजूरी के बाद अनुबंध की राह साफ हो गई है। यह फैसला आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी मजबूती देगा। देश में ही युद्धपोत बनने से विदेशी निर्भरता घटेगी। हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की समुद्री सुरक्षा भी मजबूत होगी।
कैबिनेट की सुरक्षा समिति ने बुधवार को दी मंजूरी
कैबिनेट की सुरक्षा समिति बड़े रक्षा सौदों को अंतिम मंजूरी देती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को हुई बैठक में यह फैसला लिया गया। सरकार ने अभी अनुबंध की तारीख की घोषणा नहीं की है। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि हस्ताक्षर जल्द होंगे।
पहला युद्धपोत 2030 तक मिलेगा
पहले युद्धपोत की डिलीवरी 2030 तक होने का लक्ष्य है। शिपयार्ड इस समयसीमा को और कम करने की कोशिश कर रहे हैं। नौसेना को इन युद्धपोतों से समुद्र में निगरानी की क्षमता बढ़ेगी। आधुनिक तकनीक से लैस ये जहाज दुश्मन की नजर से बचकर चल सकेंगे। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह सौदा नौसेना के आधुनिकीकरण में मील का पत्थर साबित होगा।
