Indore Purushottam Maas Katha: पंडित राजेश शास्त्री ने सुनाया ध्रुव प्रसंग, मिला भक्ति और संकल्प का संदेश

Dainik R Times
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Indore Panchkuian Shri Ram Mandir Purushottam Maas Bhagwat Katha during Dhruv Prasang by Pandit Rajesh Shastri

Purushottam Maas Katha में ध्रुव प्रसंग का वर्णन, Indore के पंचकुइयां श्री राम मंदिर में उमड़े श्रद्धालु

Purushottam Maas Katha के अंतर्गत Indore के पंचकुइयां स्थित शंभू सत्संग भवन, श्री राम मंदिर में आयोजित श्रीमद भागवत भक्ति ज्ञान यज्ञ में श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या पहुंच रही है। कथा के तृतीय दिवस पर परम पूज्य पंडित राजेश शास्त्री ने ध्रुव प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया। वहीं उन्होंने बताया कि दृढ़ संकल्प, निरंतर प्रयास और सच्ची भक्ति से जीवन में सफलता अवश्य प्राप्त होती है।

उन्होंने कहा कि व्यक्ति यदि किसी लक्ष्य का निश्चय कर ले और निरंतर उस दिशा में आगे बढ़ता रहे, तो भगवान की कृपा से असंभव भी संभव हो जाता है। ध्रुव का जीवन इसका श्रेष्ठ उदाहरण है।

Purushottam Maas Katha में सुनाया गया ध्रुव का प्रेरणादायक प्रसंग

कथा के दौरान पंडित राजेश शास्त्री ने बताया कि राजा उत्तानपाद की दो रानियां थीं। बड़ी रानी सुनीति और छोटी रानी सुरुचि थीं। राजा का अधिक स्नेह छोटी रानी सुरुचि के प्रति था।

एक दिन राजा अपनी गोद में सुरुचि के पुत्र उत्तम को बैठाकर स्नेह कर रहे थे। उसी समय बालक ध्रुव भी पिता की गोद में बैठने पहुंचे। हालांकि रानी सुरुचि ने उन्हें रोक दिया। इसके अलावा उन्होंने ध्रुव को अपमानित करते हुए कहा कि राजा की गोद में बैठने का अधिकार केवल उनके पुत्र को है।

Purushottam Maas Katha से मिला दृढ़ संकल्प का संदेश

अपमान के बाद ध्रुव दुखी हुए। वहीं उनकी माता सुनीति ने उन्हें धैर्य और भक्ति का मार्ग दिखाया। इसके बाद मात्र पांच वर्ष की आयु में ध्रुव ने भगवान विष्णु की आराधना करने का संकल्प लिया।

दरअसल ध्रुव ने कठिन परिस्थितियों को हार नहीं माना। बल्कि उन्होंने उन्हें अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। इसलिए आज भी उनका नाम श्रद्धा और भक्ति के साथ लिया जाता है।

भगवान विष्णु की तपस्या से प्रसन्न हुए देवता

देवर्षि नारद के मार्गदर्शन में ध्रुव वन में चले गए। वहां उन्होंने कठोर तपस्या शुरू की। साथ ही निरंतर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप किया।

उनकी भक्ति इतनी प्रबल थी कि तीनों लोक प्रभावित हो उठे। इसके बाद भगवान विष्णु स्वयं उनके सामने प्रकट हुए और उन्हें दर्शन दिए।

ध्रुव तारा के रूप में मिला अचल पद

कथा में बताया गया कि भगवान विष्णु ने ध्रुव को अचल पद का वरदान दिया। इसी कारण ध्रुव तारा स्थिरता, विश्वास और भक्ति का प्रतीक माना जाता है।

धार्मिक मान्यता है कि प्रलय के समय भी ध्रुव तारा अपने स्थान से नहीं हटता। वहीं यह भगवान की अपने भक्तों पर विशेष कृपा का प्रतीक भी माना जाता है।

कथा के समापन पर श्रद्धालुओं ने धर्म, भक्ति और संकल्प का संदेश ग्रहण किया। इसके अलावा आयोजन को सफल बनाने में श्री राम मंदिर पंचकुइयां समिति के सदस्यों का विशेष सहयोग रहा।

Official Source / Reference

  • श्री राम मंदिर पंचकुइयां समिति
  • श्रीमद भागवत भक्ति ज्ञान यज्ञ आयोजन समिति

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