महाराष्ट्र में निकाय चुनाव का माहौल अब सिर्फ सीटों तक सीमित नहीं रह गया है। यह मुकाबला सत्ता-सिंहासन और नेताओं की साख पर भी केंद्रित हो गया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस और शिंदे शिवसेना के नेता एकनाथ शिंदे, दोनों ही महायुति के बड़े चेहरे हैं, लेकिन निकाय चुनाव में उनकी दोस्ती का मुखौटा उतर चुका है।
बीजेपी और शिंदे शिवसेना के बीच टकराव खुलकर सामने आ रहा है। जहां दोनों दल मैदान में आमने-सामने हैं, वहां महायुति के अंदरूनी संघर्ष को जनता भी देख रही है। फड़णवीस ने शिंदे को रावण करार दिया और कहा कि “हम लंका जला देंगे”, जिससे महाराष्ट्र का सियासी तापमान एकदम उबलते बिंदु तक पहुंच गया। इस बयान ने चुनावी जंग को सिर्फ राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से बढ़ाकर निजी सत्ता संघर्ष का रूप दे दिया।
शिंदे ने भी पलटवार किया। उनका कहना है कि वे ठाणे और मुंबई में बीजेपी के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए तैयार हैं। इससे यह स्पष्ट हो गया कि अब मित्रता का मुखौटा हट चुका है और असली लड़ाई दोनों दलों के अंदर की जमीन पर है।
महाराष्ट्र में निकाय चुनाव तीन चरणों में हो रहे हैं। दूसरे चरण के तहत 2 दिसंबर को 288 सीटों पर मतदान होगा। लेकिन असली लड़ाई केवल वोट या सीटों की नहीं है, बल्कि टिकट वितरण, पकड़ और नेतृत्व की है। बीजेपी ने कई जगह शिंदे समर्थकों को तोड़कर मैदान में उतार दिया, जिसे शिंदे अपनी जमीन पर सीधी चोट मान रहे हैं।
गठबंधन में होने के बावजूद मैदान में यह मुकाबला फड़णवीस और शिंदे के बीच खुलकर दिखाई दे रहा है। विधानसभा और लोकसभा चुनावों में साथ रहने वाली महायुति अब निकाय चुनाव में बिखरती नजर आ रही है। यह न केवल दो नेताओं के बीच सत्ता संघर्ष है, बल्कि महायुति की एकता और भविष्य को भी चुनौती दे रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस चुनाव का परिणाम महायुति के अगले राजनीतिक कदमों और महाराष्ट्र की सियासी दिशा दोनों को प्रभावित करेगा। फड़णवीस और शिंदे की रणनीतियों पर जनता की नजर है, क्योंकि यह सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की सत्ता संरचना में बदलाव का संकेत भी हो सकता है।
असली सवाल यही है कि लंका जलेगी या महायुति ही राख बन जाएगी। यह निकाय चुनाव सिर्फ सीटों के लिए नहीं, बल्कि दो बड़े नेताओं के सियासी भविष्य और उनके सत्ता संघर्ष का निर्णायक युद्ध बन गया है।

