पोलैंड में संवैधानिक न्यायालय के अध्यक्ष के निलंबन से बड़ा सियासी संकट खड़ा हो गया है। Poland Constitutional Crisis शुक्रवार की शाम से गहराता जा रहा है। न्यायाधीश अन्ना कोरविन-प्योत्रोव्स्का ने न्यायालय के अध्यक्ष बोगदान श्वियंत्स्कोव्स्की और उपाध्यक्ष बार्तोमिए सोखांस्की को निलंबित करने की घोषणा की। इसके बाद उन्होंने अस्थायी रूप से न्यायालय का कार्यभार भी संभाल लिया।
न्यायालय के मौजूदा नेतृत्व ने इस कदम को ‘तख्तापलट का प्रयास’ बताया है। उसका कहना है कि श्वियंत्स्कोव्स्की अब भी अध्यक्ष बने हुए हैं। न्याय मंत्री वाल्देमार ज़ुरेक ने दोनों वरिष्ठ न्यायाधीशों की कानूनी छूट हटाने की मांग की है। इससे उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही का रास्ता खुल सकता है।
Poland Constitutional Crisis: रातोंरात क्या हुआ
शुक्रवार शाम को सैकड़ों प्रदर्शनकारी वारसॉ में न्यायालय के बाहर जमा हो गए। कुछ प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा घेरा तोड़ने की कोशिश की। पुलिस ने तीन लोगों को हिरासत में लिया। न्यायालय की वेबसाइट भी कुछ देर के लिए बंद हो गई।
राष्ट्रपति करोल नावरोकी सेनेगल की आधिकारिक यात्रा पर जा रहे थे। हालात बिगड़ते देख उन्होंने विमान को बीच रास्ते से वापस मोड़ लिया। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि ऐसे समय में राष्ट्रपति को पोलैंड में ही होना चाहिए। वे देर रात वारसॉ लौट आए।
राष्ट्रपति का विमान बीच रास्ते से लौटा
वारसॉ लौटने के बाद नावरोकी ने राष्ट्रपति भवन में श्वियंत्स्कोव्स्की से मुलाकात की। इसके बाद वे रात करीब 1 बजे न्यायालय भवन के अंदर भी गए। उनके साथ सर्वोच्च न्यायालय के प्रथम अध्यक्ष ज़बिग्नेव कापिंस्की भी थे। स्थानीय टीवी फुटेज में वे भीड़ के बीच से न्यायालय में जाते दिखे।
प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने इस कदम का बचाव किया है। उन्होंने कहा कि कानून के शासन की बहाली जटिल और कभी-कभी दर्दनाक प्रक्रिया है। इसके लिए निर्णायक कदम जरूरी हैं। हालांकि विपक्षी दल कानून और न्याय (पीआईएस) ने इसे सरकार की साजिश बताया है।
न्यायपालिका पर लंबा विवाद
पोलैंड में न्यायपालिका को लेकर विवाद 2023 से चल रहा है। टस्क की सरकार ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता बहाल करने का वादा किया था। हालांकि पीआईएस से जुड़े राष्ट्रपतियों ने उनके प्रयासों को वीटो से रोका है। श्वियंत्स्कोव्स्की पीआईएस सरकार में उप न्याय मंत्री रह चुके हैं।
कोरविन-प्योत्रोव्स्का उन पांच न्यायाधीशों में से हैं जिन्हें मौजूदा संसद ने चुना है। हालांकि राष्ट्रपति नावरोकी ने उन्हें शपथ नहीं दिलाई है। इसलिए न्यायालय में दो धड़ों के बीच अधिकार का संघर्ष जारी है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।
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